हम अपनी खाद्य-पूर्ति में जैव-विविधता की खतरनाक कमी देख रहे हैं। हरित क्रांति एक मिला-जुला वरदान है। समय के साथ-साथ, किसानों की निर्भरता व्यापक रूप से अपनाई गई उच्च उपज वाली फसलों पर बहुत अधिक बढ़ती गई है और वे स्थानीय दशाओं से अनुकूलता रखने वाली किस्मों को छोड़ते गए हैं। विशाल खेतों में आनुवंशिकतः एकसमान (जेनेटिकली यूनिफॉर्म) बीजों की एक-फसली खेती से बड़ी हुई उपज प्राप्त करने और भूख की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है। तथापि, उच्च उपज वाली किस्मों आनुवंशिकतः दुर्बल फसलें भी होती हैं जिनके लिए मँहगे रासायनिक उर्वरकों और विषाक्त कीटनाशकों की जरूरत होती है। उगाए जा रहे खाद्य-पदार्थों की मात्रा बढ़ाने पर ही आज अपना ध्यान केंद्रित कर, हम अनजाने में स्वयम् को भावी खाद्य-अभाव होने के जोखिम में डाल चुके हैं।
उपर्युक्त परिच्छेद से निम्नलिखित में से कौनसा, सबसे तर्कसंगत और निर्णायक निष्कर्ष (इन्फरेंस) निकाला जा सकता है ?
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