जब तक उन शक्तियों और प्रवृत्तियों को, जो देश के पर्यावरण को नष्ट करने के लिए उत्तरदायी हैं, निकट भविष्य में नियंत्रित नहीं किया जाता, और अनाच्छादित क्षेत्रों में वृहद् पैमाने पर वनरोपण आरंभ नहीं किया जाता, विषम जलवायु दशाएँ और पवन तथा जल के द्वारा होने वाला भू-क्षरण इस सीमा तक बढ़ जाएगा कि धीरे-धीरे कृषि, जो हमारे लोगों का मुख्य आधार है, असंभव हो जाएगी। विश्व के मरुस्थलीय देश और राजस्थान के हमारे अपने मरु प्रदेश, वृहद् पैमाने पर हुए वनोन्मूलन के दुष्परिणामों की भयावह याद दिलाते हैं। मरु सदृश भू-दृश्य अब गंगा-सतलुज के मैदानों और दक्कन पठार समेत देश के अन्य भागों में अनेक स्थानों
पर दिखाई देने लगे हैं। जहाँ कुछ ही दशक पूर्व बारहमासी सरिताओं और सोतों के साथ हरे-भरे वन हुआ करते थे, वहाँ अब, सिर्फ वर्षा ऋतु को छोड़कर, सूखी सरिताएँ और सूखे सोते, और हरियाली से रिक्त भूरे मैदान दिखाई देते हैं।
उपर्युक्त परिच्छेद के अनुसार, वनोन्मूलन और अनाच्छादन के अंततोगत्वा निम्नलिखित में से क्या परिणाम होंगे?
- मृदा संसाधन का क्षरण
- आम आदमी के लिए जमीन की कमी
- कृषि के लिए जल की कमी
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
उपर्युक्त परिच्छेद के अनुसार, वनोन्मूलन और अनाच्छादन के अंततोगत्वा निम्नलिखित में से क्या परिणाम होंगे?
- मृदा संसाधन का क्षरण
- आम आदमी के लिए जमीन की कमी
- कृषि के लिए जल की कमी
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