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Q. 41
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पिछली दो या तीन पीढ़ियों से व्यक्तियों की सतत बढ़ती हुई संख्या मनुष्यों की तरह नहीं, वरन् केवल कामगारों की तरह जीवन जीती रही है। अत्यधिक मात्रा में श्रम करना आज समाज के हर क्षेत्र में एक नियम बन गया है, जिसका परिणाम यह हुआ है कि व्यक्ति में आध्यात्मिक तत्त्व की संपन्नता नहीं हो पाती है। वह अपने थोड़े से अवकाश-समय को किसी गम्भीर गतिविधि में लगाने में अत्यधिक कठिनाई महसूस करता है। वह मनन करना नहीं चाहता; या यदि वह चाहे तो कर भी नहीं पाता। वह तलाश करता है, पर आत्मोन्नति की नहीं बल्कि मनोरंजन की, जो उसे इस लायक बनाता है कि वह मानसिक रूप से खाली हो और अपनी सामान्य गतिविधियों को भूल जाए। इसलिए हमारे युग की तथाकथित संस्कृति, नाट्यकला की अपेक्षा चलचित्र पर, गम्भीर साहित्य की अपेक्षा समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और अपराध-कथाओं पर, अधिक आधारित है।

यह परिच्छेद इस विचार पर आधारित है कि

A

मनुष्य को कठिन श्रम नहीं करना चाहिए

B

हमारे युग की सबसे बड़ी बुराई अत्यधिक कार्य-तनाव है

C

मनुष्य अच्छी तरह मनन नहीं कर सकता

D

मनुष्य अपने आध्यात्मिक कल्याण का ध्यान नहीं रख सकता

Kepler. Discussing PYQs. Q.no. 41