गरीबी रेखा नितांत असंतोषजनक हो जाती है, जब यह समझने की बात आती है कि भारत में गरीबी का प्रसार कहाँ तक है। यह केवल इसलिए नहीं है कि इसकी परिभाषा बहुत ही संकीर्ण है कि ‘गरीब कौन है’ और गरीब की गणना करने की क्रिया-पद्धति विवादास्पद है, बल्कि यह इसके अंदर निहित अपेक्षाकृत अधिक मूलभूत धारणा के कारण है। यह गरीबी को अपर्याप्त आय या अपर्याप्त क्रयशक्ति के रूप में समझने पर अनन्य रूप से निर्भर है। इसे बेहतर रूप में आय-निर्धनता कहकर वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि गरीबी अंततोगत्वा उन चीजों से वंचित होना है, जो मनुष्य के सुख-स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, तो आय-निर्धनता इसका केवल एक पहलू है। जीवन-निर्धनता, हमारे विचार में, सिर्फ वह कंगाली की दशा में नहीं है, जिसमें व्यक्ति वास्तव में रहता है, किन्तु दूसरी तरह के जीवन के विकल्प चुनने के लिए वास्तविक अवसर के अभाव में भी है जो सामाजिक बाधाओं और साथ ही साथ वैयक्तिक परिस्थितियों द्वारा प्रदत्त है। निम्न आय की प्रासंगिकता, अपने पास कम चीजों का होना, और वे अन्य पहलू भी जिन्हें मानक रूप से आर्थिक निर्धनता के रूप में देखा जाता है, अंततोगत्वा सामर्थ्य को कम करने की, अर्थात् जिन चीजों के विकल्प चुनने से लोग विविधतापूर्ण और मूल्यवान जीवन जीते हैं, उन्हें अत्यधिक सीमित कर देने की उनकी भूमिका से संबंधित होते हैं।
आय-निर्धनता 'गरीब' की गणना की एकमात्र माप क्यों है?
आय-निर्धनता 'गरीब' की गणना की एकमात्र माप क्यों है?