खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, मानव उपभोग के लिए उत्पादित खाद्यान्न के एक-तिहाई की विश्वव्यापी हानि या बर्बादी होती है। आरंभिक कृषि उत्पादन से लेकर अंतिम घरेलू उपभोग तक की संपूर्ण आपूर्ति शृंखला के दौरान खाद्यान्न की हानि या बर्बादी होती है। इस बढ़ती बर्बादी के परिणामस्वरूप लगभग 45% तक भूमि-निम्नीकरण (लैंड डिग्रेडेशन) भी हुआ है, जिसके मुख्य कारण निर्वनीकरण, असंधारणीय कृषि पद्धतियाँ और अत्यधिक भूजल निष्कर्षण हैं। बरबाद हुए खाद्यान्न पर व्यय की गई ऊर्जा के परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष लगभग 3.5 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन होता है। क्षय के परिणामस्वरूप वायुमंडल में अन्य गैसों का हानिकारक उत्सर्जन भी होता है। खाद्यान्न पर्यासता और खाद्यान्न संधारणीयता के चक्र को पूरा करने के लिए खाद्यान्न की सभी रूपों में हानि या बर्बादी का समाधान करना महत्वपूर्ण है।
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- खाद्यान्न की हानि और बर्बादी को कम करने के लिए खाद्यान्न वितरण तंत्र की पुनः परिकल्पना करने और इसे प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।
- खाद्यान्न की बर्बादी और हानि में कमी लाने को सुनिश्चित करना सभी नागरिकों का एक सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व है।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी मान्य है/हैं?
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- खाद्यान्न की हानि और बर्बादी को कम करने के लिए खाद्यान्न वितरण तंत्र की पुनः परिकल्पना करने और इसे प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।
- खाद्यान्न की बर्बादी और हानि में कमी लाने को सुनिश्चित करना सभी नागरिकों का एक सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व है।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी मान्य है/हैं?