हाल के वर्षों में, भारत न केवल खुद अपने अतीत की तुलना में, बल्कि अन्य देशों की तुलना में भी, तेजी से विकसित हुआ है । किन्तु इसमें किसी आत्मसंतोष की गुंजाइश नहीं हो सकती, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इससे भी अधिक तीव्र विकास करना और इस संवृद्धि के लाभों को, अब तक जितना किया गया है उससे कहीं अधिक व्यापक रूप से, अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना सम्भव है । उन सूक्ष्म-संरचनात्मक परिवर्तनों के प्रकारों के ब्यौरों में जाने से पहले, जिनकी हमें संकल्पना करने और फिर उन्हें कार्यान्वित करने की ज़रूरत है, समावेशी संवृद्धि के विचार को विस्तार से देखना सार्थक होगा, जो कि इस सरकार की विभिन्न आर्थिक नीतियों और निर्णयों के पीछे एक निरूपक संकल्पना निर्मित करता है । समावेशी संवृद्धि में रुचि रखने वाला राष्ट्र इसी संवृद्धि को एक भिन्न रूप में देखता है जो इस पर आधारित है कि क्या संवृद्धि के लाभों का जनसंख्या के एक छोटे हिस्से पर ही अम्बार लगा दिया गया है या इनमें सभी लोगों की व्यापक रूप से साझेदारी है । अगर संवृद्धि के लाभों में व्यापक रूप से साझेदारी है तो यह खुशी की बात है, पर अगर संवृद्धि के लाभ एक हिस्से पर ही केंद्रित हैं, तो नहीं । दूसरे शब्दों में, संवृद्धि को अपने आप में एक साध्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सभी तक संपन्नता पहुँचाने के एक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए । भारत के स्वयं के अतीत के अनुभव तथा दूसरे राष्ट्रों के अनुभव भी, यह सुझाते हैं कि संवृद्धि गरीबी के उन्मूलन के लिए आवश्यक
तो है परन्तु यह एक पर्याप्त शर्त नहीं है । दूसरे शब्दों में, संवृद्धि को बढ़ाने की नीतियों को ऐसी और नीतियों से सम्पूरित किया जाना आवश्यक है जो यह सुनिश्चित करें कि अधिकाधिक लोग संवृद्धि की प्रक्रिया में शामिल हों, और यह भी, कि ऐसी क्रियाविधियाँ उपलब्ध हों जिनसे कुछ लाभ ऐसे लोगों में पुनर्वितरित किए जाएँ जो बाजार-प्रक्रिया में भागीदार होने में अक्षम हैं और इस कारण पीछे छूट जाते हैं ।
समावेशी संवृद्धि के इस विचार को एक अधिक सुस्पष्ट रूप देने का एक सरल तरीका यह है कि किसी राष्ट्र की उन्नति को उसके सबसे गरीब हिस्से, उदाहरणार्थ, जनसंख्या के सबसे निचले 20%, की उन्नति के आधार पर मापा जाए । जनसंख्या के इस सबसे निचले पाँचवें हिस्से की प्रति व्यक्ति आय को मापा जा सकता है और आय की वृद्धि-दर की गणना भी की जा सकती है; और सबसे गरीब हिस्से से सम्बन्धित इन मापकों के आधार पर हमारी आर्थिक सफलता का आकलन किया जा सकता है । यह दृष्टि आकर्षक है, क्योंकि यह संवृद्धि की उस तरह उपेक्षा नहीं करती जैसी कि कुछ पहले के परम्पराविरुद्ध मानदण्डों में की जाती थी । यह बस जनसंख्या के सबसे गरीब हिस्से की आय की वृद्धि को ही देखती है । यह इसे भी सुनिश्चित करती है कि ऐसे लोगों की भी उपेक्षा न हो जो इस निचले पाँचवें हिस्से से बाहर हैं । अगर ऐसा हो, तो पूरी सम्भावना है कि वे लोग भी इस निचले पाँचवें हिस्से में आ जाएँ और इस प्रकार अपने-आप ही हमारी इन नीतियों का सीधा लक्ष्य बन जाएँ । इस प्रकार यहाँ सुझाए गए मानदण्ड समावेशी संवृद्धि के विचार का सांख्यिकीय समाकलन हैं जो परिणामतः दो उपसिद्धांतों की ओर ले जाते हैं : यह इच्छा करना कि आवश्यक रूप से भारत ऊँची संवृद्धि प्राप्त करने का प्रयास करे और हम इसे सुनिश्चित करने के लिए कार्य करें कि संवृद्धि से सबसे गरीब हिस्से लाभान्वित हों ।
इस परिच्छेद में, लेखक की दृष्टि का केन्द्रबिन्दु क्या है ?
इस परिच्छेद में, लेखक की दृष्टि का केन्द्रबिन्दु क्या है ?