जलवायु परिवर्तन, भारत की कृषि पर संभावित रूप से विध्वंसकारी प्रभाव रखता है । जबकि, जलवायु परिवर्तन के समग्र प्राचल वर्धमानतः स्वीकृत हैं — अगले 30 वर्ष में 1°C की औसत ताप वृद्धि, इसी अवधि में 10 cm से कम की समुद्र तल वृद्धि, और क्षेत्रीय मानसून विचरण तथा संगत अनावृष्टि — भारत में प्रभाव काफी स्थल एवं फसल विशिष्ट होने संभावित हैं । कुछ फसलें परिवर्तनशील दशाओं के प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया दे सकती हैं, दूसरी नहीं भी दे सकती हैं । इससे कृषि अनुसंधान को प्रोत्साहन देने और प्रणाली में अनुकूलन हो सके इस हेतु, अधिकतम नम्यता बनाने की आवश्यकता पर बल पड़ता है ।
“अनावृष्टि रोधन” का मुख्य संघटक अंतःजलस्तर का प्रबंधित पुनर्भरण है । महत्वपूर्ण आधारिक फसलों (जैसे, गेहूँ) की लगातार उपज सुनिश्चित करने के लिए, ताप परिवर्तनों तथा जल उपलब्धता को देखते हुए इन फसलों की उगाई वाले स्थानों को बदलना भी आवश्यक हो सकता है । दीर्घावधि निवेश के निर्णय करने में जल उपलब्धता एक मुख्य कारक होगा ।
उदाहरण के लिए, अगले 30 वर्षों में जैसे-जैसे हिमनद पिघलते जाते हैं, हिमालय क्षेत्र से जल के बहाव के बढ़ते जाने, और तदनंतर अत्यधिक घटते जाने का पूर्वानुमान किया गया है । कृषि-पारिस्थितिक दशाओं में बड़े पैमाने पर आने वाले इन बदलावों के लिए योजना बनाने हेतु प्रोत्साहन प्रदान करना निर्णायक होगा ।
भारत के लिए कृषि अनुसंधान और विकास में दीर्घावधि निवेश करना आवश्यक है । यह संभावित है कि भारत को भविष्य में एक बदले हुए मौसम प्रतिरूप का सामना करना होगा ।
इस परिच्छेद के अनुसार, भारत में कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण क्यों है ?
इस परिच्छेद के अनुसार, भारत में कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण क्यों है ?