यह अक्सर भुला दिया जाता है कि विश्वव्यापीकरण केवल अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों और लेन-देन संबंधी नीतियों के बारे में ही नहीं है, बल्कि इसका सरोकार समान रूप से राष्ट्र की घरेलू नीतियों से भी है । अंतर्राष्ट्रीय रूप से (WTO आदि द्वारा) मुक्त व्यापार और निवेश प्रवाह संबंधी नियत दशाओं को पूरा करने हेतु किए गए आवश्यक नीतिगत परिवर्तन प्रत्यक्षतः
घरेलू उत्पादकों तथा निवेशकों को प्रभावित करते हैं । किन्तु विश्वव्यापीकरण में अधःशायी आधारभूत दर्शन कीमतों, उत्पादन तथा वितरण प्रतिरूप के निर्धारण के लिए बाजारों की अबाध स्वतंत्रता पर बल देता है, तथा सरकारी हस्तक्षेपों को उन प्रक्रियाओं के रूप में देखा है जो विकृति उत्पन्न करती हैं तथा अदक्षता लाती हैं । अतः सार्वजनिक उद्यमों का विनिवेशों तथा विक्रयों द्वारा निजीकरण हो; और अभी तक जो क्षेत्र और कार्यकलाप सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित हैं, आवश्यक है कि उन्हें प्राइवेट क्षेत्र के लिए खोल दिया जाए । इस तर्क का विस्तार शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी सामाजिक सेवाओं तक है । कामगारों की छैटनी के माध्यम से श्रम-बल का समायोजन करने पर लगे प्रतिबंध हटा लिए जाने चाहिए तथा तालाबंदी पर लगे प्रतिबंधों को हटाकर निर्गमन को अपेक्षाकृत आसान बनाया जाना चाहिए । रोजगार तथा बेतन बाज़ार शक्तियों की स्वतंत्र गतिविधियों द्वारा शासित होना चाहिए, क्योंकि उनको नियंत्रित करने में कोई भी उपाय निवेश को हतोत्साहित कर सकते हैं तथा उत्पादन में अदक्षता भी उत्पन्न कर सकते हैं । सर्वोपरि रूप से, राज्य की भूमिका में कमी लाने के समग्र दर्शन के अनुरूप, ऐसे राजकोषीय सुधार किए जाने चाहिए जिनसे आमंतौर पर कराधान के स्तर निम्न हों तथा वित्तीय विवेक के सिद्धांत के पालन हेतु शासकीय खर्च न्यूनतम हो । ये सब घरेलू स्तर पर किए जाने वाले नीतिगत कार्य हैं तथा विश्वव्यापीकरण कार्यसूची के सारभाग विषयों, यथा, माल और वित्त के स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय प्रवाह से प्रत्यक्षतः संबंधित नहीं हैं ।
इस परिच्छेद के अनुसार, विश्वव्यापीकरण का आधारभूत दर्शन क्या है ?
इस परिच्छेद के अनुसार, विश्वव्यापीकरण का आधारभूत दर्शन क्या है ?