यह परमावश्यक है कि हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाएँ और इस तरह आगामी वर्षों और दशकों में होने वाले जलवायु परिवर्तन के कुछ बदतरीन प्रभावों से बचें। उत्सर्जन कम करने के लिए ऊर्जा के उत्पादन और उपभोग के हमारे तरीकों में एक बड़ा बदलाव अपेक्षित होगा। जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता से हटना अतिविलम्बित है, किन्तु दुर्भाग्य से, प्रौद्योगिकीय विकास धीमा और अपर्याप्त रहा है, मोटे तौर पर इसलिए, कि तेल की अपेक्षाकृत निम्न कीमतों से जन्मी अदूरदर्शिता के कारण सरकारी नीतियाँ अनुसंधान और विकास में निवेश को प्रोत्साहन नहीं देती रही हैं। इसलिए अब राष्ट्रीय अनिवार्यता के रूप में वृहत् पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा को काम में लाने के अवसर का लाभ उठाना भारत जैसे देश के लिए अत्यावश्यक है। यह देश ऊर्जा के सौर, वायु और जैवमात्रा स्रोतों से अत्यधिक सम्पन्न है। दुर्भाग्य से, जहाँ हम पीछे हैं, वह है इन स्रोतों को काम में लाने के लिए प्रौद्योगिकीय समाधान विकसित और सर्जित करने की हमारी क्षमता।
जलवायु परिवर्तन पर अंतःसरकारी पैनल (IPCC) द्वारा निर्धारित रूप में ग्रीनहाउस गैसों को सख्ती से कम करने के लिए एक विशिष्ट प्रक्षेप-पथ स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता को दिखाता है कि ग्रीनहाउस गैसों के भूमंडलीय उत्सर्जनों का चरम बिन्दु 2015 को पार न करे और उसके आगे तेज़ी से
घटने लगे। ऐसे प्रक्षेप-पथ के साथ संबद्ध लागत वस्तुतः मर्यादित है और इसकी राशि, IPCC के आकलन में, 2030 में विश्व GDP के 3 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। दूसरे शब्दों में, सम्पन्नता के जिस स्तर पर विश्व बिना उत्सर्जन में कमी लाए पहुँच सकता, खराब-से-खराब हालत में कुछ मास या अधिक-से-अधिक एक वर्ष तक टल जाएगी। स्पष्टतः यह, जलवायु परिवर्तन से जुड़े बदतरीन खतरों से करोड़ों लोगों को बचाने के लिए चुकाई जाने वाली कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है। तथापि, ऐसे किसी प्रयास के लिए जीवन-शैलियों को भी उपयुक्त रूप से बदलना होगा। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना सिर्फ एक प्रौद्योगिकीय उपाय भर नहीं है, और इसके लिए स्पष्टतः जीवन-शैलियों में बदलाव और देश की आर्थिक संरचना में रूपांतरण अपेक्षित है, जिसके द्वारा, उत्सर्जन को प्रभावी रूप से कम किया जाए, जैसे कि जीव प्रोटीन के काफी कम मात्राओं में उपभोग के माध्यम से। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने यह निर्धारित किया है कि पशुधन क्षेत्रक से उत्सर्जन कुल उत्सर्जन का 18 प्रतिशत होता है। इस स्रोत से हो रहे उत्सर्जन में कमी लाना पूरी तरह मनुष्यों के हाथ में है, जिन्होंने अपनी अधिक-से-अधिक जीव प्रोटीन के उपभोग की आहार-आदतों के कारण पड़ने वाले प्रभाव पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया। वस्तुतः उत्सर्जन में कमी लाने के विशाल सह-सुलाभ हैं, जैसे अपेक्षाकृत कम वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी लाभ, उच्चतर ऊर्जा सुनिश्चितता तथा और अधिक रोज़गार।
इस परिच्छेद का सारभूत संदेश क्या है ?
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