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Q. 54
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अनेक राष्ट्र अब पूँजीवाद में विश्वास रखते हैं तथा सरकारें अपने लोगों के लिए सम्पत्ति सर्जित करने की रणनीति के रूप में इसे चुनती हैं। ब्राजील, चीन और भारत में उनकी अर्थव्यवस्थाओं के उदारीकरण के पश्चात् देखी गई भव्य आर्थिक संवृद्धि इसकी विशाल सम्भाव्यता और सफलता का प्रमाण है। तथापि, विश्वव्यापी बैंकिंग संकट तथा आर्थिक मंदी कड़ियों के लिए विस्मयकारी रहा है। चर्चाओं का केंद्रबिन्दु मुक्त बाज़ार संक्रियाओं और बलों, उनकी दक्षता और स्वयं सुधार करने की उनकी योग्यता की ओर हुआ है। विश्वव्यापी बैंकिंग प्रणाली की असफलता को दर्शाने हेतु न्याय, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के मुद्दों का वर्णन विरले ही किया जाता है। इस प्रणाली के समर्थक पूँजीवाद की सफलता का औचित्य ठहराते ही जाते हैं और उनका तर्क है कि वर्तमान संकट एक धक्का था।

उनके तर्क उनके विचारधारागत पूर्वग्रह को इस पूर्वधारणा के साथ प्रकट करते हैं कि अनियंत्रित बाज़ार न्यायोचित तथा समर्थ होता है, और निजी लालच का व्यवहार वृहत्तर लोकहित में होगा।

कुछ लोग पूँजीवाद और लालच के बीच द्विदिशिक सम्बन्ध होने की पहचान करते हैं; कि दोनों एक-दूसरे को परिपुष्ट करते हैं। निश्चित रूप से, इस व्यवस्था से लाभ पाने वाले धनाढ्य और सशक्त खिलाड़ियों के बीच हितों के टकराव, उनके झुकाव और विचारधाराओं के अपेक्षाकृत अधिक ईमानदार सम्प्रत्ययीकरण की आवश्यकता है; साथ ही सम्पत्ति सर्जन को केंद्रबिन्दु में रखने के साथ उसके परिणामस्वरूप जनित सकल असमानता को भी दर्शाया जाना चाहिए।

इस परिच्छेद से “निजी लालच का व्यवहार वृहत्तर लोकहित में होगा”,

A
  1. पूँजीवाद की झूठी विचारधारा को निर्दिष्ट करता है।
B
  1. मुक्त बाज़ार के न्यायसंगत दावों को स्वीकार करता है।
C
  1. पूँजीवाद के सद्भावपूर्ण चेहरे को दिखाता है।
D
  1. परिणामी सकल असमानता की उपेक्षा करता है।
Kepler. Discussing PYQs. Q.no. 54