असमानता इस मूल लोकतांत्रिक प्रतिमानक का उल्लंघन करती है कि सभी नागरिक समान हैं। समानता वह संबंध है, जो कुछेक मूलभूत विशेषताओं के संबंध में व्यक्तियों के बीच होती है, जिसे वे सामान्य रूप से साझा करते हैं। नैतिकता की दृष्टि से कहें तो समानता एक स्वतः निर्धारित सिद्धांत है। इसलिए प्रजाति, जाति, लिंग, संजातीयता, निःशक्तता, या वर्ग जैसे आधारों पर व्यक्तियों के बीच भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। मानवीय स्थिति की ये विशेषताएँ नैतिक दृष्टि से संगत नहीं हैं। यह विचार कि व्यक्तियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए, न केवल इस कारण से कि इनमें से कुछेक व्यक्तियों के पास कुछ असाधारण विशेषताएँ अथवा प्रतिभा होती है, जैसे, इनमें से कुछेक व्यक्ति कुशल क्रिकेट खिलाड़ी, प्रतिभाशाली संगीतकार, अथवा विख्यात साहित्यकार होते हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे सभी मनुष्य हैं, अब सामान्यबुद्धि-नीति का अंग बन गया है।
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :