क्या कोई लोकतंत्र दीर्घ समय तक कल्याणकारी राज्य होने से बच सकता है ? जन कल्याण को पूर्ण रूप से बाज़ार पर क्यों नहीं छोड़ा जा सकता है ? बाज़ार और लोकतंत्र के बीच अंतर्निहित तनाव विद्यमान है। बाज़ार एक-व्यक्ति-एक-मत (वोट) के सिद्धांत पर कार्य नहीं करते हैं, जैसा कि लोकतंत्र में होता है। कोई व्यक्ति बाज़ार से क्या ले पाता है, यह उसकी प्रतिभा, कौशल, क्रय-शक्ति तथा माँग और आपूर्ति की क्षमता पर निर्भर करता है। बाज़ार व्यक्ति के प्रयासों और कौशल का प्रतिफल देते हैं, और बहुत से लोगों को समाज के निचले पायदान से ऊपर भी उठा सकते हैं, किंतु कुछ लोगों को ऐसे कौशलों के विकास के लिए कभी अवसर ही नहीं मिल पाता है, बाज़ार में जिनकी माँग है; ऐसे लोग सामान्यतः बहुत गरीब होते हैं और बहुत अक्षम होते हैं; अथवा इनमें कौशल विकसित करने में काफी समय लगता है। बाज़ार नौकरियाँ सृजित करके अकुशल लोगों की भी सहायता कर सकते हैं, किंतु पूँजीवाद हमेशा से बेरोजगारी-विस्फोट का साक्षी रहा है।
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- आधुनिक लोकतंत्र बाज़ार की शक्तियों पर निर्भर करते हैं ताकि वे कल्याणकारी राज्य बन सकें।
- लोकतंत्रों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक पर्याप्त आर्थिक वृद्धि को बाज़ार सुनिश्चित करते हैं।
- आर्थिक विकास में पीछे छूट गए लोगों के लिए सरकारी कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ मान्य है/हैं ?
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- आधुनिक लोकतंत्र बाज़ार की शक्तियों पर निर्भर करते हैं ताकि वे कल्याणकारी राज्य बन सकें।
- लोकतंत्रों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक पर्याप्त आर्थिक वृद्धि को बाज़ार सुनिश्चित करते हैं।
- आर्थिक विकास में पीछे छूट गए लोगों के लिए सरकारी कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ मान्य है/हैं ?