मैं पक्के तौर पर कह सकता हूँ कि मेरे स्वाभाविक शर्मिलेपन के कारण, सिवाय यदा-कदा हास्य का पात्र बन जाने के, मेरा किसी भी तरह और कोई नुकसान नहीं हुआ। वास्तव में, आज मुझे लगता है, कि इसके विपरीत, मुझे कुछ फायदा ही हुआ। बोलने का जो संकोच मुझे पहले कष्टकर था, वह अब सुखकर है। इसका सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ कि इसने मुझे शब्दों की मितव्ययिता सिखाई। मुझे अपने विचारों पर काबू रखने की आदत सहज ही पड़ गई। और अब मैं खुद को यह प्रमाण-पत्र दे सकता हूँ कि मेरी जीभ या कलम से बिना विचारे शायद ही कोई शब्द निकलता हो। मुझे याद नहीं पड़ता कि अपने भाषण या लेख के किसी अंश के लिए मुझे कभी पछताना पड़ा हो। इस तरह मैं अनेक खतरों से बचा हूँ और मेरा बहुत-सा समय बचा है। अनुभव ने मुझे यह सिखाया है कि सत्य के उपासक के लिए मौन उसके आध्यात्मिक अनुशासन का अंग है। मनुष्य की यह स्वाभाविक कमजोरी है कि वह जाने-अनजाने में अक्सर बढ़ा-चढ़ा कर बोलता है अथवा जो कहने योग्य है उसे छिपाता है या भिन्न रूप में कहता है। इस पर विजय पाने के लिए भी मौन आवश्यक है। कम बोलने वाला बिना विचारे न बोलेगा; अपने प्रत्येक शब्द को तौलेगा। हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य बोलने के लिए आतुर रहते हैं। किसी बैठक का ऐसा कोई सभापति न होगा जिसे बोलने की अनुमति माँगने वाली चिटों से परेशान न होना पड़ा हो। और जब भी बोलने का समय दिया जाता है तो वक्ता आमतौर पर समय-सीमा से आगे बढ़ जाता है, और अधिक समय की माँग करता है, और बिना इजाज़त के भी बोलता रहता है। इस सारे बोलने से दुनिया का कोई लाभ हुआ हो ऐसा शायद ही कहा जा सकता है। यह समय का घोर अपव्यय है। मेरी लज्जाशीलता दरअसल मेरी ढाल और आड़ ही बनी रही। उससे मुझे परिपक्व होने का लाभ मिला। सत्य को पहचानने में मुझे उससे सहायता मिली।
लेखक कहता है कि उसकी जीभ या कलम से बिना विचारे शायद ही कोई शब्द निकलता हो। निम्नलिखित में से कौन-सा एक, इसका वैध कारण नहीं है ?
लेखक कहता है कि उसकी जीभ या कलम से बिना विचारे शायद ही कोई शब्द निकलता हो। निम्नलिखित में से कौन-सा एक, इसका वैध कारण नहीं है ?