जलवायु परिवर्तन एक ऐसा जटिल नीतिगत मुद्दा है जो वित्त पर व्यापक प्रभाव डालता है। जलवायु परिवर्तन से निपटने वाले हर प्रयास में अन्ततः लागत शामिल है। भारत जैसे देशों के लिए, अनुकूलन (अडैप्टेशन) तथा न्यूनीकरण (मिटिगेशन) की योजनाओं और परियोजनाओं के अभिकल्पन और कार्यान्वयन के लिए निधीयन (फंडिंग) अत्यावश्यक है। निधि का अभाव अनुकूलन योजनाओं के कार्यान्वयन में एक बड़ी बाधा है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) (UNFCCC) के अन्तर्गत बहुस्तरीय वार्ताओं में, विकासशील देशों द्वारा उनके घरेलू न्यूनीकरण तथा अनुकूलन कार्यों के संवर्धन के लिए अपेक्षित वित्तीय सहायता का पैमाना तथा परिमाण सघन चर्चा के विषय हैं। यह सम्मेलन विकसित देशों पर, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) के जमाव में उनके योगदान के आधार पर, वित्तीय सहायता का प्रावधान करने की समान रूप से जिम्मेदारी डालता है। इस कार्य की मात्रा तथा उसके लिए निधियों की आवश्यकता को देखते हुए, विकासशील देशों की मौजूदा तथा अनुमानित (प्रोजेक्टेड) आवश्यकताओं के लिए जरूरी घरेलू वित्तीय संसाधन कम पड़ने की संभावना है। इस सम्मेलन (कन्वेंशन) की बहुपक्षीय क्रियाविधि के माध्यम से किया गया वैश्विक निधीयन, न्यूनीकरण प्रयासों के वित्तपोषण के लिए उनकी घरेलू क्षमता की वृद्धि करेगा।
64. इस परिच्छेद के अनुसार, जलवायु परिवर्तन में विकासशील देशों की भूमिका के संदर्भ में UNFCCC के अन्तर्गत बहुपक्षीय वार्ताओं में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से, गहन चर्चा का/के विषय है/हैं ?
67. इस परिच्छेद में, निम्नलिखित में से किस एक पर अनिवार्यतः विचार-विमर्श किया गया है ?
67. इस परिच्छेद में, निम्नलिखित में से किस एक पर अनिवार्यतः विचार-विमर्श किया गया है ?