हम अक्सर भारत में विभिन्न राज्यों के बीच नदी जल को ले कर विवाद होने के बारे में सुनते रहते हैं। 20 प्रमुख नदी तंत्रों में से, 14 में पहले से ही जल की तंगी है; 75% जनसंख्या जल की तंगी वाले क्षेत्रों में रहती है, जिनमें से एक-तिहाई लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ जल का अभाव है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या की माँगें और कृषि द्वारा इनको पूरा करने की आवश्यकता, तथा तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण एवं औद्योगीकरण जल की तंगी को और बढ़ाएँगे। भारत के संविधान के अनुसार, राज्यों के बीच नदियों के विनियमन को छोड़ कर, जल राज्य का विषय है, केंद्र का नहीं। इसके विभिन्न हितधारियों की आपस में होड़ लेती माँगों के बीच संतुलन सुनिश्चित करने की कुंजी इस बात में है, कि द्रोणी (बेसिन) पर आधारित रीति से संघटक क्षेत्रों के और राज्यों के बीच जल का बँटवारा किया जाए। उन्हें जल का उचित भाग देने के लिए इन सब वस्तुनिष्ठ मापदंडों के आधार पर आकलन किया जाना आवश्यक है, कि नदी द्रोणी की क्या विशिष्टताएँ हैं, उस पर कितनी बड़ी जनसंख्या निर्भर है, जल का वर्तमान उपयोग क्या है और माँग कितनी है, कितना दक्षतापूर्ण उपयोग किया जा रहा है, भविष्य में कितने उपयोग की आवश्यकता होगी, आदि, और साथ-साथ नदी और जलभर की पर्यावरणीय ज़रूरतों को भी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक, विभिन्न हितधारियों को जल का उचित और साम्यिक बँटवारा सुनिश्चित करने के लिए सर्वाधिक युक्तियुक्त, व्यावहारिक और तात्कालिक कार्रवाई को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है ?
निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक, विभिन्न हितधारियों को जल का उचित और साम्यिक बँटवारा सुनिश्चित करने के लिए सर्वाधिक युक्तियुक्त, व्यावहारिक और तात्कालिक कार्रवाई को सर्वोत्तम रूप से प्रतिबिंबित करता है ?