भारत में, नगरीय अपशिष्ट का स्रोत पर पृथक्करण दुर्लभ है। पुनर्चक्रण अधिकांशतः अनौपचारिक क्षेत्रक के पास है। नगरपालिका बजट का तीन-चौथाई से अधिक अंश संग्रहण और परिवहन में चला जाता है, जिससे प्रसंस्करण/संसाधन पुनर्प्राप्ति और निपटान के लिए अत्यंत कम अंश बचता है। इन सब में अपशिष्ट-से-ऊर्जा कहाँ उपयुक्त जगह पाती है? आदर्श रूप से, यह शृंखला में पृथक्करण (गीले अपशिष्ट और अन्य के बीच), संग्रहण, पुनर्चक्रण के पश्चात् और भराव-क्षेत्र में जाने से पहले उपयुक्त जगह पाती है। अपशिष्ट को ऊर्जा में बदलने की कौन-सी प्रौद्योगिकी सर्वाधिक उपयुक्त है, यह इस पर निर्भर है कि अपशिष्ट में क्या है (अर्थात् घटक जैवनिम्नीकरणीय है या नहीं है) और उसका कैलोरी मान क्या है। भारत के नगरीय ठोस अपशिष्ट का जैवनिम्नीकरणीय घटक 50 प्रतिशत से किंचितमात्र ज्यादा है, और जैवमेथेन (बायोमेथेनेशन) से इसके प्रसंस्करण के लिए एक बड़ा हल मिल सकता है।
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- नगरीय अपशिष्ट का संग्रहण, प्रसंस्करण और पृथक्करण सरकारी एजेंसियों के पास होना चाहिए।
- संसाधन पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण को प्रौद्योगिकीय आगंतों की अपेक्षा होती है जिन्हें निजी क्षेत्र के उद्यम सर्वोत्तम रूप से प्रबंधित कर सकते हैं।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी सही है/हैं?
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- नगरीय अपशिष्ट का संग्रहण, प्रसंस्करण और पृथक्करण सरकारी एजेंसियों के पास होना चाहिए।
- संसाधन पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण को प्रौद्योगिकीय आगंतों की अपेक्षा होती है जिन्हें निजी क्षेत्र के उद्यम सर्वोत्तम रूप से प्रबंधित कर सकते हैं।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी सही है/हैं?