पिछले कुछ दशकों के दौरान भारत में खाद्य उपभोग के स्वरूप पर्याप्त रूप से बदल गए हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि ज्वार-बाजारा जैसे अनेक पोषक खाद्यपदार्थ लुप्त हो गए हैं । हालाँकि स्वतन्त्रता के बाद से अब तक खाद्यान्न का उत्पादन पाँच गुने से अधिक बढ़ गया है, फिर भी इससे कुपोषण की समस्या का पर्याप्त रूप से समाधान नहीं हुआ है । लंबे समय तक, कृषि क्षेत्र का ध्यान खाद्यान्न, विशेष कर प्रधान खाद्यान्नों, के उत्पादन में वृद्धि पर रहा, जिसके परिणामस्वरूप देशी पारंपरिक फ़सलों/अनाजों, फलों व अन्य सब्जियों के उत्पादन व उपभोग में कमी आई, और इस प्रक्रिया में खाद्य और पोषण सुरक्षा प्रभावित हुई है । इसके अतिरिक्त, गहन, एकधान्य कृषि प्रथाओं से भूमि, जल और उनसे प्राप्त खाद्य की गुणता निम्नीकृत होती है, जिसके कारण खाद्य और पोषण सुरक्षा की समस्या चिरस्थायी हो सकती है ।
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- सतत विकास लक्ष्यों को कार्यान्वित करने के लिए और भुखमरी को पूरी तरह मिटाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकधान्य कृषि प्रथाएँ अपरिहार्य हैं, भले ही इनसे कुपोषण का समाधान न हो ।
- कुछ ही फ़सलों पर निर्भरता से मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नकारात्मक परिणाम होते हैं ।
- खाद्य आयोजना विषयक सरकारी नीतियों में पोषण की सुरक्षा का समावेशन आवश्यक है ।
- वर्तमान एकधान्य कृषि प्रथाओं के लिए किसान अनेक तरीकों से उपदान (सब्सिडी) और सरकार द्वारा अनाजों के लिए दी जाने वाली लाभप्रद कीमतें प्राप्त करते हैं और इसलिए वे फ़सल विविधता पर विचार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होते ।
उपर्युक्त में से कौन-कौन सी पूर्वधारणाएँ वैध हैं ?
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- सतत विकास लक्ष्यों को कार्यान्वित करने के लिए और भुखमरी को पूरी तरह मिटाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकधान्य कृषि प्रथाएँ अपरिहार्य हैं, भले ही इनसे कुपोषण का समाधान न हो ।
- कुछ ही फ़सलों पर निर्भरता से मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नकारात्मक परिणाम होते हैं ।
- खाद्य आयोजना विषयक सरकारी नीतियों में पोषण की सुरक्षा का समावेशन आवश्यक है ।
- वर्तमान एकधान्य कृषि प्रथाओं के लिए किसान अनेक तरीकों से उपदान (सब्सिडी) और सरकार द्वारा अनाजों के लिए दी जाने वाली लाभप्रद कीमतें प्राप्त करते हैं और इसलिए वे फ़सल विविधता पर विचार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होते ।
उपर्युक्त में से कौन-कौन सी पूर्वधारणाएँ वैध हैं ?