हमारे देश में, हथकरघों को परंपराओं का सातत्य सुनिश्चित करने वाली संस्कृति से समीकृत किया जाता है। यह विचार लोक नीति-निर्माण का भाग बन गया है और राज्य को इस क्षेत्र को बल प्रदान करने के लिए एक वैध आधार प्रदान करता है। किन्तु आज एकल, रैखिक सत्त्व के रूप में परंपरा की इस धारणा का पुरजोर विरोध किया जा रहा है। संस्कृति/परंपरा को एक खास तरीके से परिभाषित करने में प्रभावी आख्यानों को इस रूप में देखा जा रहा है, कि इनसे बड़े वर्गों की पहचान और इतिहास निर्गमित हुए हैं। कम की गई और कभी-कभी बलात् दबाई गई पहचानें इतिहास में अपने उचित स्थान के लिए संघर्ष कर रही हैं। इस पृष्ठपट के सम्मुख, जब हथकरघे को पारंपरिक उद्योग के रूप में प्रोत्साहित किया जाता है, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग इसकी उपेक्षा करना पसंद करता है।
उपर्युक्त परिच्छेद के सन्दर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- I. हथकरघा क्षेत्र में राज्य को किसी भी रूप में अंतर्ग्रस्त होने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- II. तेजी से बदलते हुए आधुनिक विश्व में हथकरघा उत्पाद अब पसंदीदा और आकर्षक नहीं रह गए हैं।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी वैध है/हैं ?
उपर्युक्त परिच्छेद के सन्दर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- I. हथकरघा क्षेत्र में राज्य को किसी भी रूप में अंतर्ग्रस्त होने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- II. तेजी से बदलते हुए आधुनिक विश्व में हथकरघा उत्पाद अब पसंदीदा और आकर्षक नहीं रह गए हैं।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी वैध है/हैं ?