“एक अच्छा राजनीतिज्ञ, किसी भी अन्य समझदार मनुष्य की तरह, अपने उत्साही समर्थकों की अपेक्षा अपने विरोधियों से अधिक सीखता है। क्योंकि जब तक उसके विरोधी उसे न दिखाएँ कि खतरा कहाँ है, उसके समर्थक उसे संकट की ओर धकेल देंगे। अतः यदि वह बुद्धिमान है, तो वह अक्सर प्रार्थना करेगा, कि उसे अपने मित्रों से मुक्ति मिले, क्योंकि वे उसे विनष्ट कर देंगे। किन्तु, भले ही यह बात आघात पहुँचाती है, उसे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि वह कभी विरोधियों से रहित न हो; क्योंकि वे उसे तर्क और सुबुद्धि के मार्ग पर बनाए रखते हैं। स्वतंत्र व्यक्तियों की राष्ट्रीय एकता, प्रशासन के स्वेच्छाचारी होने तथा विरोधी पक्ष के क्रांतिपूर्ण विचार वाले और परस्पर-विरोधी होने को दुष्कर बनाने के लिए, राजनीतिक शक्ति के पर्याप्त रूप से सम-संतुलन के ऊपर निर्भर करती है।”
उपर्युक्त परिच्छेद के सन्दर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- I. लोकतंत्र में, एक मजबूत विरोधपक्ष तभी आवश्यक है जब शासनाध्यक्ष उदासीन हो।
- II. लोकतंत्र में, विरोधपक्ष जितना आक्रामक होगा, शासन उतना ही बेहतर होगा।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी वैध है/हैं ?
उपर्युक्त परिच्छेद के सन्दर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- I. लोकतंत्र में, एक मजबूत विरोधपक्ष तभी आवश्यक है जब शासनाध्यक्ष उदासीन हो।
- II. लोकतंत्र में, विरोधपक्ष जितना आक्रामक होगा, शासन उतना ही बेहतर होगा।
उपर्युक्त पूर्वधारणाओं में से कौन-सी वैध है/हैं ?