भारत में निजता के अधिकार पर वर्तमान फोकस डिजिटल युग की कुछ नवीन वास्तविकताओं पर आधारित है। कोई भी अधिकार वास्तविक अधिकार तभी होता है यदि वह सभी स्थितियों में प्रभावी हो और सभी के लिए हो। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का अपने शोषण के विरुद्ध सुरक्षा की वास्तविक उपलब्धता के बिना स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार अर्थहीन है, जो कि यह सुनिश्चित करे कि उसके इस अधिकार को गैर-सरकारी शक्ति के प्रयोग से निष्फल न किया जा सके। इसलिए राज्य की भूमिका आधिकारिक स्वतंत्र अभिव्यक्ति में रुकावट पैदा करने से बचना मात्र ही नहीं है अपितु यह भी सक्रिय रूप से सुनिश्चित करना है कि गैर-सरकारी पक्षकार इसको अवरुद्ध करने में सक्षम न हों।
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- डिजिटल समाज में राज्य के पास ऐसी संस्थाएँ होनी चाहिए जो इसकी समुचित भूमिका को सुनिश्चित कर सकें।
- राज्य को सुनिश्चित करना चाहिए कि गैर-सरकारी पक्षकार नागरिकों की निजता के अधिकार का हनन न करें।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था नागरिकों की निजता का हनन न करने के विचार से सुसंगत नहीं है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं?
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- डिजिटल समाज में राज्य के पास ऐसी संस्थाएँ होनी चाहिए जो इसकी समुचित भूमिका को सुनिश्चित कर सकें।
- राज्य को सुनिश्चित करना चाहिए कि गैर-सरकारी पक्षकार नागरिकों की निजता के अधिकार का हनन न करें।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था नागरिकों की निजता का हनन न करने के विचार से सुसंगत नहीं है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं?