औद्योगिक सेक्टर को मिलने वाले बैंक ऋण में संकुचन प्रारंभ हो गया है। इसमें कमी गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि ऋण का प्रसार निवेश को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक है। समस्या के उद्गम पिछले 25 वर्षों के अपूर्ण सुधारों में निहित हैं। 1991 के सुधारों के उपरांत बैंकों के लिए समाधान निगम की स्थापना का एक संस्थागत परिवर्तन होना चाहिए था। तेजी और मंदी वाली एक बाजार अर्थव्यवस्था में बैंकों को स्थापित करने एवं उन्हें असफल होने की अनुमति होनी चाहिए। आज हम बैंकों को बंद नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें बंद करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। कमजोर, हानि में रहने वाले बैंकों को निरंतर अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।
61. उपर्युक्त परिच्छेद से निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वाधिक तार्किक और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
- (a) भारतीय बैंकिंग व्यवस्था देश की आर्थिक विकास में मदद नहीं कर पा रही है।
- (b) 1991 में प्रारंभ किए गए आर्थिक सुधारों ने अर्थव्यवस्था के अपेक्षित स्तर तक सुधार में सहायता नहीं की है।
- (c) भारत में बैंकों की असफलता से निपटने के लिए संस्थागत प्रक्रिया नहीं है।
- (d) औद्योगिक सेक्टर में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देना उस सेक्टर के बैंक ऋण के ऊपर निर्भरता का एक अच्छा विकल्प है।
61. उपर्युक्त परिच्छेद से निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वाधिक तार्किक और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
61. उपर्युक्त परिच्छेद से निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वाधिक तार्किक और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला जा सकता है?