भारत में, प्राधिकारी मानसून ऋतु में जलाशयों में अधिकतम जल संचय करने की कोशिश करते हैं, जिसे गर्मी के महीनों में सिंचाई एवं विद्युत् उत्पादन के लिए प्रयोग में लाया जाता है। मानसून ऋतु आने के समय जलाशय में जल को एक निश्चित स्तर से नीचे बनाए रखना एक अंतर्राष्ट्रीय रूप में स्वीकार्य प्रथा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब मानसून की वर्षा होती है तो अतिरेक वर्षा जल के संचयन के लिए जगह हो तथा जल को नियंत्रित रूप में छोड़ा भी जा सके। परंतु प्राधिकारी मानसून के समाप्त होने से पहले ही जलाशयों में अधिक-से-अधिक जल संचय कर लेते हैं, जिससे अधिक विद्युत् उत्पादन एवं सिंचाई सुनिश्चित की जा सके।
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- जलाशयों में अधिकतम जल संचयन में होने वाले भारी जोखिम, जलशक्ति परियोजनाओं पर हमारी अत्यधिक निर्भरता के कारण है।
- बाँधों की संग्रहण क्षमता का मानसून ऋतु के पूर्व अथवा दौरान पूर्ण उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
- भारत में बाढ़ नियंत्रण के लिए बाँधों की भूमिका को कम करके आँका गया है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं?
उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- जलाशयों में अधिकतम जल संचयन में होने वाले भारी जोखिम, जलशक्ति परियोजनाओं पर हमारी अत्यधिक निर्भरता के कारण है।
- बाँधों की संग्रहण क्षमता का मानसून ऋतु के पूर्व अथवा दौरान पूर्ण उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
- भारत में बाढ़ नियंत्रण के लिए बाँधों की भूमिका को कम करके आँका गया है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं?