यद्यपि आजकल उगायी जाने वाली अधिकतर आनुवंशिकतः रूपांतरित (जी० एम०) फसलें एकल लक्षण के लिए आनुवंशिकतः अभिरचित हैं, भविष्य में फसलों का एक से अधिक लक्षणों के लिए आनुवंशिकतः अभिरचित होना सामान्य मानक होगा। अतः कृषि में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका और उसके नियमन को, अकेले जी० एम० फसलों की वर्तमान पीढ़ी के प्रसंग में नहीं समझा जा सकता। बल्कि विभिन्न पहलुओं को जिनमें सामाजिक-आर्थिक प्रभाव सम्मिलित हैं, ध्यान में रखते हुए एक व्यापक अवलोकन की आवश्यकता है, ताकि नकारात्मक प्रभावों को न्यूनीकृत करते हुए प्रौद्योगिकी की क्षमता का उपयोग किया जा सके। उन किस्मों के विकास में, जो जलवायु परिवर्तन के प्रशमन और अनुकूलन में मददगार हैं, जैव प्रौद्योगिकी के महत्त्व के आलोक में, जलवायु परिवर्तन की कार्य-योजना के एक अंश के रूप में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग न करना, एक विकल्प नहीं हो सकता। जैव प्रौद्योगिकी के घरेलू नियमन को व्यापार नीति और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संधियों तथा सम्मेलनों के अंतर्गत दायित्वों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
5. उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
5. उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
5. उपर्युक्त परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :