checking user
checking user
checking user
checking user
Q. 27
DiscussAttempt

पिछले कुछ वर्षों में भारत के वित्तीय बाजारों ने बहुत गहनता और तरलता प्राप्त की है। 1991 से हुए सतत सुधारों ने विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय

अर्थव्यवस्था और इसकी वित्तीय व्यवस्था के अंतर्सम्बन्धों और एकीकरण को आगे बढ़ाया है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में दुर्बल विश्व आर्थिक प्रत्याशाओं और अनवरत विद्यमान अनिश्चितताओं ने उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर स्पष्ट प्रभाव डाला है। सार्वभौम जोखिम से जुड़े सरोकारों ने, विशेषकर यूरो क्षेत्र में, ग्रीस की घोर ऋण समस्या की संक्रामकता से प्रभावित होकर, जो कि अस्थिरता के सामान्य से अधिक ऊँचे स्तर के रूप में भारत और अन्य अर्थव्यवस्थाओं में फैल रही है, पूरे वर्ष के बृहत्तर हिस्से में वित्तीय बाजारों को प्रभावित किया है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजारों की निधीयन बाधाएँ बैंकों और निगमों के लिए विदेशी निधीयन की उपलब्धता और लागत दोनों को प्रभावित कर सकती थीं। चूँकि, भारतीय वित्तीय तंत्र में बैंकों का प्रभुत्व है, बैंकों की तनाव को झेल पाने की क्षमता पूरी वित्तीय स्थिरता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, भारतीय बैंक, हाल के वर्षों में पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्तियों के अनुपात में गिरावट और गैर-निष्पादन-पूर्ण परिसंपत्तियों के स्तरों में वृद्धि के बावजूद मजबूत बन रहे हैं। पूँजी पर्याप्तता स्तर नियामक आवश्यकताओं से ऊपर बने हुए हैं। वित्तीय बाजार की आधारिक संरचना बिना किसी बड़ी रुकावट के परिचालित हो रही है। आगे वित्तीय तंत्र का और अधिक विश्वव्यापीकरण, संघटन, विनियंत्रण और विविधीकरण होने पर बैंकिंग कार्य और अधिक जटिल और जोखिमपूर्ण हो सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में जोखिम और तरलता के प्रबंधन तथा कुशलता में वृद्धि जैसे मुद्दे और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

निम्नलिखित में से किसके कारण जोखिम और तरलता के प्रबंधन को भविष्य में भारतीय बैंकिंग तंत्र में अधिक महत्त्व मिल सकता है ?

A
  1. और अधिक विश्वव्यापीकरण ।
B
  1. वित्तीय तंत्र का और अधिक संघटन और विनियंत्रण ।
C
  1. वित्तीय तंत्र का और अधिक विविधीकरण ।
D
  1. अर्थव्यवस्था में और अधिक वित्तीय समावेशन ।
Kepler. Discussing PYQs. Q.no. 27