विश्व के दुखों को केवल भौतिक सहायता द्वारा मिटाया नहीं जा सकता । जब तक कि मनुष्य का स्वभाव न बदले, उसकी भौतिक आवश्यकताएँ सदैव बढ़ती रहेंगी, और दुखों को सदा अनुभव किया जाता रहेगा, और भौतिक सहायता की कोई भी मात्रा उन्हें पूर्णतः दूर नहीं कर सकेगी । समस्या का एकमात्र समाधान यह है कि मानव जाति को विशुद्ध बनाया जाए । अज्ञानता बुराई की जननी है, और उन सभी दुखों की भी, जिन्हें हम देखते हैं । मनुष्य को प्रकाश मिले, वे विशुद्ध और आत्मिक रूप से सशक्त एवं शिक्षित हों; केवल तभी दुनिया से दुख कम होंगे । हम देश के प्रत्येक घर को धर्मार्थ-शरणस्थल में बदल सकते हैं, हम धरती को अस्पतालों से भर सकते हैं, परन्तु जब तक मनुष्य का चरित्र परिवर्तित न होगा मानवीय दुख अनवरत बने रहेंगे ।
परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित धारणाएँ बनाई गई हैं :
- लेखक मानवीय दुखों के उन्मूलन में भौतिक और सांसारिक सहायता को प्राथमिक महत्त्व देता है।
- धर्मार्थ आवास, अस्पताल, इत्यादि मानवीय दुखों को एक बड़ी सीमा तक दूर कर सकते हैं।
इन धारणाओं में कौन-सा/से वैध है/हैं ?
परिच्छेद के संदर्भ में, निम्नलिखित धारणाएँ बनाई गई हैं :
- लेखक मानवीय दुखों के उन्मूलन में भौतिक और सांसारिक सहायता को प्राथमिक महत्त्व देता है।
- धर्मार्थ आवास, अस्पताल, इत्यादि मानवीय दुखों को एक बड़ी सीमा तक दूर कर सकते हैं।
इन धारणाओं में कौन-सा/से वैध है/हैं ?