हमारे सामने कठोर परिश्रम है। जब तक हम अपने प्रण को संपूर्णतः पूरा नहीं कर लेते, जब तक हम भारत के सभी लोगों को वह नहीं बना देते जो कि नियति चाहती है कि वे हों, तब तक हममें से किसी को आराम नहीं करना है। हम एक महान देश के नागरिक हैं, सुस्पष्ट प्रगति के कगार पर हैं, और हमें उन उच्च आदर्शों को जीवन में उतारना है। हम सभी, चाहे हम किसी भी धर्म के हों, समान रूप से भारत की संतान हैं और हमारे अधिकार, विशेषाधिकार और दायित्व बराबर हैं। हम साम्प्रदायिकता अथवा मानसिक संकीर्णता को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई भी देश, जिसके लोग विचारों अथवा आचरण में संकीर्ण हों, महान नहीं हो सकता।
उपर्युक्त परिच्छेद का लेखक लोगों को क्या प्राप्त करने की चुनौती देता है?
उपर्युक्त परिच्छेद का लेखक लोगों को क्या प्राप्त करने की चुनौती देता है?