इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनीतिक सिद्धांतकारों को अन्याय, जैसे कि अस्पृश्यता, के इतिहास को गंभीरता से लेना चाहिए। ऐतिहासिक अन्याय की अवधारणा में अनेक प्रकार के ऐतिहासिक अपकारों को विचार में लिया गया है, जो किसी न किसी रूप में वर्तमान में भी हो रहे हैं, और उनकी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि उनमें सुधार न हो पाए। सुधार न होने देने के पीछे दो कारण कहे जा सकते हैं। एक तो यह, कि केवल इतना ही नहीं कि अन्याय की जड़ें इतिहास में गहरी जमी हुई हैं, बल्कि अन्याय स्वयं भी शोषण की आर्थिक संरचनाओं, भेदभाव की विचारधाराओं और प्रतिनिधित्व की रीतियों को संरचित करता है। दूसरा यह, कि ऐतिहासिक अन्याय की कोटि आम तौर पर बहुत से अपकारों, जैसे कि आर्थिक वंचन, सामाजिक भेदभाव और मान्यता के अभाव, के आर-पार फैली होती है। यह कोटि जटिल होती है, केवल इसलिए नहीं कि इसमें बहुत से अपकारों के बीच कोई स्पष्ट सीमा-रेखा नहीं होती, बल्कि इसलिए कि किसी न किसी अपकार की, आम तौर पर भेदभाव की, प्रवृत्ति दूसरे अपकारों से आंशिक रूप में स्वायत्तता हासिल कर लेने की होती है। यह भारत में सुधार के इतिहास से सिद्ध हुआ है।
इस परिच्छेद से कौन-सा मुख्य विचार अनुगत होता है ?
इस परिच्छेद से कौन-सा मुख्य विचार अनुगत होता है ?