किसी अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने अल्प-पोषित तथा सुपोषित शिशुओं और छोटे बच्चों के सूक्ष्मजीवों (माइक्रोबायोम्स) की तुलना की। कुपोषित और स्वस्थ बच्चों के मल के नमूनों से आहार-नली के रोगाणुओं को अलग किया गया। एक ही उम्र के स्वस्थ बच्चों में पाए गए सुविकसित "परिपक्व" सूक्ष्मजीवों की तुलना में कुपोषित बच्चों में सूक्ष्मजीवों "अपरिपक्व" और कम विविध पाया गया। कुछ अध्ययनों के अनुसार, माँ के दूध के रासायनिक संघटन में एक आपरिवर्तित शर्करा (सायलीलेटेड ओलिगोसैक्कराइड्स) पाई गई है। इसका शिशु द्वारा अपने खुद के पोषण के लिए उपयोग नहीं किया जाता। तथापि, शिशु का सूक्ष्मजीवों संरचित करने वाले जीवाणु इस शर्करा पर, जो उनके खाद्य की तरह काम आता है, फलते-फूलते हैं। कुपोषित माताओं के दूध में इस शर्करा की मात्रा कम होती है। परिणामस्वरूप, उनके शिशुओं के सूक्ष्मजीवों परिपक्व होने में विफल हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप शिशुओं में कुपोषण पाया जाता है।
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- अपरिपक्व आहार-नली जीवाणु संघटन के कारण कुपोषण से ग्रस्त बच्चों के उपचार के लिए एक समाधान प्रसंस्कृत जीवाणुयुक्त (प्रोबायोटिक) खाद्य पदार्थ है।
- कुपोषित माताओं के शिशुओं में आमतौर पर कुपोषित होने की प्रवृत्ति होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं ?
उपर्युक्त परिच्छेद के आधार पर निम्नलिखित पूर्वधारणाएँ बनाई गई हैं :
- अपरिपक्व आहार-नली जीवाणु संघटन के कारण कुपोषण से ग्रस्त बच्चों के उपचार के लिए एक समाधान प्रसंस्कृत जीवाणुयुक्त (प्रोबायोटिक) खाद्य पदार्थ है।
- कुपोषित माताओं के शिशुओं में आमतौर पर कुपोषित होने की प्रवृत्ति होती है।
उपर्युक्त में से कौन-सी पूर्वधारणा/पूर्वधारणाएँ वैध है/हैं ?